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Kasturi Mrig Ka Itihas: हिमालय की अमूल्य धरोहर कस्तूरी मृग का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्त्व

Kasturi Mrig Ka Itihas: कस्तूरी मृग न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि इसकी कस्तूरी के कारण यह अत्यंत मूल्यवान भी है।

Shivani Jawanjal
Published on: 3 April 2025 6:52 PM IST (Updated on: 3 April 2025 7:57 PM IST)
Kasturi Mrig Ka Itihas
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Kasturi Mrig Ka Itihas

Kasturi Mrig Ka Itihas: कस्तूरी मृग (Moschus chrysogaster) हिमालयी(Himalaya) क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक दुर्लभ और बहुमूल्य जीव है, जो अपनी विशिष्ट सुगंधित कस्तूरी के लिए प्रसिद्ध है। इसकी नाभि से उत्पन्न होने वाली कस्तूरी का उपयोग पारंपरिक औषधियों, इत्र और सुगंधित उत्पादों में किया जाता है, जिससे इसकी वैश्विक मांग अत्यधिक बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश, इसी बहुमूल्यता के कारण यह मृग शिकारियों और अवैध व्यापारियों के निशाने पर रहता है, जिसके परिणामस्वरूप इसकी आबादी तेजी से घट रही है। लगातार घटते प्राकृतिक आवास और अवैध शिकार के कारण यह प्रजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही है, जिससे इसका संरक्षण अब एक महत्वपूर्ण और गंभीर विषय बन गया है। इस दुर्लभ प्राणी की रक्षा के लिए सख्त कानूनों और जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि जैव विविधता का यह अनमोल हिस्सा सुरक्षित रह सके।

कस्तूरी मृग का वैज्ञानिक परिचय (Scientific Classification)

कस्तूरी मृग (Musk Deer) एक दुर्लभ और बहुमूल्य स्तनपायी (Mammal - Mammalia) प्राणी है, जो मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्र और सुदूर पर्वतीय जंगलों में पाया जाता है। यह अपनी सुगंधित कस्तूरी के लिए प्रसिद्ध है, जो इसके नाभि ग्रंथि से उत्पन्न होती है। वैज्ञानिक वर्गीकरण (Scientific Classification - साइंटिफिक क्लासिफिकेशन) के अनुसार, यह एनिमेलिया (Animalia ) साम्राज्य के अंतर्गत आता है और इसका संबंध कॉरडेटा (Chordata ) संघ से है। यह मैमेलिया (Mammalia ) वर्ग का प्राणी है और आर्टियोडैक्टाइला (Artiodactyla ) गण में शामिल है। कस्तूरी मृग मॉस्किडी (Moschidae ) कुल से संबंधित है, जिसका वंश मॉस्कस (Moschus ) है और इसकी प्रमुख प्रजाति मॉस्कस क्रायसोगास्टर (Moschus chrysogaster ) मानी जाती है। यह मृग अपनी दुर्लभता और अनोखी विशेषताओं के कारण संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसकी कस्तूरी की उच्च मांग के कारण इसका अवैध शिकार किया जाता है।

कस्तूरी का उल्लेख हिंदू ग्रंथों में(Reference in Hindu Scriptures)

रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों में कस्तूरी मृग का उल्लेख मिलता है।

श्रीराम के वनवास के दौरान स्वर्ण मृग (जो वास्तव में मायावी मारीच था) का वर्णन मिलता है, जो कस्तूरी मृग का ही प्रतीक माना जाता है।

यह कहा जाता है कि "कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे वन माहि", जिसका अर्थ है कि मनुष्य बाहर सुख की तलाश करता है, जबकि असली आनंद उसके भीतर ही है।

शारीरिक विशेषताएँ (Physical Characteristics)

यह अन्य हिरणों की तुलना में छोटा होता है और इसका शरीर सुगठित तथा हल्के भूरे रंग का होता है।

नर कस्तूरी मृग में ऊपरी जबड़े से निकले हुए लंबे दाँत होते हैं, जो इसे एक विशिष्ट पहचान देते हैं।

इसका वजन लगभग 10-18 किलोग्राम होता है और लंबाई 70-100 सेमी तक होती है।

इसकी त्वचा खुरदरी और मोटी होती है, जो इसे ठंडे वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।

आवास और वितरण (Habitat & Distribution)

कस्तूरी मृग मुख्य रूप से हिमालय, तिब्बत, नेपाल, भारत (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम), भूटान और चीन के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। कस्तूरी मृग आमतौर पर 2500 से 4500 मीटर की ऊँचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यह घने जंगलों, ऊँचे चरागाहों और झाड़ियों वाले क्षेत्रों में निवास करता है। इसे एकांतप्रिय प्राणी माना जाता है, जो अकेले रहना पसंद करता है।

आहार (Diet)

कस्तूरी मृग मुख्य रूप से शाकाहारी होता है और यह घास, पत्तियां, काई और झाड़ियों की कोमल टहनियों का सेवन करता है। यह निशाचर (रात्रिचर) प्राणी होता है और दिन में घनी झाड़ियों में छिपा रहता है। यह अत्यंत सतर्क होता है और खतरा महसूस होते ही तेजी से भाग जाता है। इसे क्रेपसक्युलर (Crepuscular) जीव कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि यह प्राणी सुबह और शाम के समय अधिक सक्रिय रहता है।

प्रजनन (Reproduction)

कस्तूरी मृग का प्रजनन काल आमतौर पर नवंबर से जनवरी के बीच होता है। मादा मृग लगभग 6 महीने के गर्भकाल (Gestation Period) के बाद एक या दो शावकों को जन्म देती है। जन्म के बाद शावक अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और घास या झाड़ियों में छिपे रहते हैं।

कस्तूरी की विशेषता(Charateristics Of Moschus chrysogaster)

कस्तूरी मृग का सबसे महत्वपूर्ण और बहुमूल्य अंग उसकी नाभि ग्रंथि होती है, जिससे एक सुगंधित पदार्थ उत्पन्न होता है, जिसे कस्तूरी ग्रंथि (Musk Gland) कहा जाता है। यह पदार्थ केवल नर मृग में पाया जाता है और यह विशेष रूप से मादा मृग को आकर्षित करने के लिए उपयोग किया जाता है। कस्तूरी का उपयोग सुगंधित इत्र, पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है।

कस्तूरी का उपयोग (Uses of Musk)

कस्तूरी, जो कस्तूरी मृग (Moschus chrysogaster) की नाभि ग्रंथि से प्राप्त होती है, प्राचीन काल से ही अपनी अद्भुत सुगंध और औषधीय गुणों के कारण अत्यधिक मूल्यवान मानी जाती है। इसका उपयोग मुख्य रूप से इत्र (Perfume), पारंपरिक औषधियों, धार्मिक अनुष्ठानों और आधुनिक चिकित्सा में किया जाता है।

इत्र और सुगंधित उत्पादों में उपयोग - कस्तूरी का उपयोग सुगंध उद्योग (Fragrance Industry) में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसकी सुगंध लंबे समय तक बनी रहती है और यह अन्य इत्र सामग्री की खुशबू को स्थायी बनाती है। प्राचीन काल में इसे राजघरानों और समृद्ध वर्ग द्वारा विशेष इत्र के रूप में उपयोग किया जाता था। आज भी, उच्च गुणवत्ता वाले लक्जरी परफ्यूम (Luxury Perfumes) में कस्तूरी का उपयोग किया जाता है। चूँकि कस्तूरी का प्राकृतिक स्रोत सीमित और संरक्षित है, अब कृत्रिम कस्तूरी (Synthetic Musk) का अधिक उपयोग किया जाता है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा - आयुर्वेद में कस्तूरी को त्रिदोष नाशक (वात, पित्त, कफ संतुलन) और कई बीमारियों के उपचार में उपयोगी माना जाता है। यह मुख्य रूप से निम्नलिखित रोगों में उपयोग होती है:

हृदय रोग (Cardiac Disorders) - हृदय की धड़कन को नियमित करने और उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) को नियंत्रित करने के लिए।

मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र (Brain & Nervous System) - मानसिक तनाव, अनिद्रा, दौरे (Epilepsy) और मानसिक विकारों में उपयोगी होती है।

सांस संबंधी रोग (Respiratory Disorders) - अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की बीमारियों में फायदेमंद।

प्रजनन स्वास्थ्य (Reproductive Health) - पुरुषों में यौन शक्ति बढ़ाने और नपुंसकता (Impotency) के उपचार में उपयोगी।

सिर दर्द और माइग्रेन (Headache & Migraine) - कस्तूरी आधारित दवाएँ माइग्रेन और गंभीर सिरदर्द में राहत देती हैं।

यूनानी चिकित्सा - यूनानी चिकित्सा में कस्तूरी को "हर्बल टॉनिक" के रूप में माना जाता है और इसे यौन शक्ति वर्धक (Aphrodisiac), तंत्रिका तंत्र सुधारक (Neurotonic) और हृदय उत्तेजक (Cardio Stimulant) के रूप में उपयोग किया जाता है।

चीनी चिकित्सा - पारंपरिक चीनी चिकित्सा (Traditional Chinese Medicine - TCM) में, कस्तूरी का उपयोग रक्त संचार को सुधारने, दर्द निवारण और सूजन कम करने के लिए किया जाता है। यह स्ट्रोक (Stroke) और बेहोशी (Unconsciousness) के उपचार में भी उपयोगी मानी जाती है।

उद्योग (Pharmaceutical Industry) - कुछ आधुनिक दवाओं में कस्तूरी का उपयोग हृदय रोग, तंत्रिका संबंधी विकार और श्वसन समस्याओं के उपचार के लिए किया जाता है। यह स्नायु तंत्र (Nervous System) को मजबूत करने और मानसिक रोगों में राहत देने के लिए उपयोगी मानी जाती है।

कॉस्मेटिक उद्योग (Cosmetic Industry) - महंगे क्रीम, बॉडी लोशन और स्किन केयर उत्पादों में इसकी सुगंध का उपयोग किया जाता है।

होम्योपैथी और नैचुरोपैथी (Homeopathy & Naturopathy) - होम्योपैथी में कस्तूरी आधारित दवाएँ सांस की बीमारियों, एंग्जायटी (Anxiety), डिप्रेशन (Depression) और मानसिक थकावट को ठीक करने में सहायक होती हैं।

कृत्रिम कस्तूरी (Synthetic Musk) का विकास - चूँकि प्राकृतिक कस्तूरी बहुत महंगी होती है और कस्तूरी मृग के संरक्षण के कारण इसका शिकार प्रतिबंधित है, इसलिए वैज्ञानिकों ने कृत्रिम कस्तूरी (Synthetic Musk) विकसित की है। कृत्रिम कस्तूरी का उपयोग इत्र, साबुन, डिटर्जेंट, डियोड्रेंट और अन्य सुगंधित उत्पादों में किया जाता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक उपयोग (Religious & Spiritual Practices)

हिंदू धर्म में कस्तूरी को अत्यधिक पवित्र माना जाता है और इसका उपयोग भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और अन्य देवी-देवताओं की पूजा में किया जाता है। विशेष रूप से, श्रीकृष्ण के भाल (माथे) पर लगने वाला कस्तूरी तिलक उनकी दिव्यता और अलौकिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसके अतिरिक्त, कस्तूरी को हवन सामग्री में मिलाकर यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में भी उपयोग किया जाता है। इसे विशेष रूप से भगवान शिव, विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा में चढ़ाया जाता है।

बौद्ध धर्म में कस्तूरी मृग को शुद्धता, ध्यान और शांति का प्रतीक माना जाता है, और तिब्बती बौद्ध धर्म में इसका उपयोग ध्यान (Meditation) और आध्यात्मिक साधना में किया जाता है। इस्लाम में कस्तूरी (Musk) को एक पवित्र और स्वर्गीय सुगंध माना गया है। पैगंबर मुहम्मद ने कहा था कि कस्तूरी स्वर्ग की सुगंधों में से एक है और इसे इस्लामिक परंपरा में पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

मध्ययुगीन ईसाई चर्चों में कस्तूरी से बने इत्र और धूप का उपयोग किया जाता था, और बाइबिल में भी सुगंधित वस्तुओं का उल्लेख है, जिनमें कस्तूरी आधारित धूप और तेलों का उपयोग किया जाता था। इसके अलावा, योग और तंत्र साधना में कस्तूरी की सुगंध को चक्र जागरण और ध्यान को गहरा करने के लिए भी उपयोग किया जाता है।

संरक्षण स्थिति (Conservation Status)

कस्तूरी मृग IUCN (International Union for Conservation of Nature) की लाल सूची (Red List) में "असुरक्षित (Endangered)" श्रेणी में रखा गया है।

इसे CITES (Convention on International Trade in Endangered Species) के परिशिष्ट I में सूचीबद्ध किया गया है, जिसका अर्थ है कि इसका शिकार और व्यापार प्रतिबंधित है।

भारत में इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित किया गया है।

संरक्षण के उपाय (Conservation Efforts)

कस्तूरी मृग संरक्षण परियोजनाओं के तहत भारत सरकार और कई गैर-सरकारी संगठन इस दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं। संरक्षित क्षेत्र और राष्ट्रीय उद्यान, जैसे उत्तराखंड का कस्तूरी मृग अभयारण्य और नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व, इस प्रजाति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन संरक्षित क्षेत्रों में कस्तूरी मृग के प्राकृतिक आवास की रक्षा के लिए कड़े उपाय किए जा रहे हैं। इसके अलावा, वैज्ञानिक कृत्रिम कस्तूरी विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि इसकी अवैध मांग को कम किया जा सके और मृगों का शिकार रोका जा सके। स्थानीय जनजातियों और समुदायों को इस संरक्षण अभियान में शामिल करने से भी इस प्रजाति को बचाने में सहायता मिल रही है, क्योंकि समुदायों की भागीदारी से अवैध शिकार पर लगाम लगाई जा सकती है। अवैध शिकार को रोकने के लिए कड़े कानून लागू किए गए हैं, जिससे कस्तूरी मृग की सुरक्षा को और मजबूत किया जा सके। कई वन्यजीव संगठन और सरकारें इसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए लगातार पहल कर रही हैं, ताकि इस दुर्लभ और अनमोल जीव को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

Admin 2

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