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Right to Repair Rules: क्या है राइट-टू-रिपेयर नियम, इससे कार्बन उत्सर्जन और इलेक्ट्रॉनिक कचरा की समस्या से मिलेगी राहत ?

Right to Repair Rules: राइट-टू-रिपेयर से जुड़े कानून की बात करें तो इसका उद्देश्य रिपेयरिंग में आने वाली समस्याओं को दूर करने से कहीं ज्यादा स्वतंत्र रिपेयरिंग करने वाले और कंपनियों के अधिकृत रिपेयर पार्टनर के बीच समान अवसर उपलब्ध करना है।

Jyotsna Singh
Published on: 20 Nov 2023 6:45 AM GMT (Updated on: 20 Nov 2023 6:45 AM GMT)
Right to Repair Rules: क्या है राइट-टू-रिपेयर नियम, इससे कार्बन उत्सर्जन और इलेक्ट्रॉनिक कचरा की समस्या से मिलेगी राहत ?
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Right to Repair Rules: नित नए आधुनिक तकनीक से सजे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से सजा बाजार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की राह पर बढ़ते हुए अपने स्वरूप का विस्तार कर रहा है। लेकिन इसका एक विभत्स रूप ई कचरे के तौर पर भी देखने को मिल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक कचरा, या ई-कचरे का मुद्दा अब बहुत ज्यादा गंभीर होता जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट का तेज़ी से बढने का मतलब है कि इन उपकरणों की अब कोई कीमत नहीं है, यानी इन्हे रिपेयर करवा कर दुबारा इन्हें इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है। लेकिन ऐसा कहना बिलकुल भी उचित नहीं होगा। इलेक्ट्रोनिक वेस्ट में फालतू समझ कर फेके जाने वाले कई उपकरण बिल्कुल भी बेकार नहीं होते हैं। वास्तव में पुन: उपयोग के लिए आसानी से रिपेयर किया जा सकता है।

अब रोजमर्रा की जीवन शैली में स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप से लेकर वाहनों का प्रयोग देश के कोने में किया जा रहा है। वहीं बात इन गैजेट्स की रिपेयरिंग की आती है तो इनको रिपेयर करवाना काफी महंगा सौदा साबित होता है। ज्यादा तर इन गैजेट्स की रिपेयरिंग कॉस्ट इनकी मूल कीमत के बराबर या उससे भी अधिक पड़ जाती है। ऐसे में पर्यावरण में तेजी के साथ ईवेस्ट से बढ़ रहे प्रदूषण पर नियंत्रण रखने और लोगों के लिए उनके महंगें गैजेट्स की रिपेयरिंग को आसान बनाने के लिए काफी समय से राइट-टू-रिपेयर (मरम्मत का अधिकार) मुद्दे पर आवाज ही उठाई जा रही है। इस अधिकार का मुख्य उद्देश्य ग्राहकों को उनके महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के रिप्लेसमेंट की जगह उन्हें रिपेयरिंग का एक सस्ता प्लेटेफॉर्म उपलब्ध कराना है। जहां उपभोक्ता अपने उपकारणों की मरम्मत करवाने के लिए उसमें इस्तेमाल होने वाले कई ऐसे पुर्जे जिनके प्रयोग का अधिकार सिर्फ कंपनी के पास ही होता है उन्हें अब उपभोक्ता खुद से बदलने में सक्षम होंगे।

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आइये जानते हैं कि राइट-टू-रिपेयर से जुड़े डिटेल्स के बारे में.....

क्या है राइट-टू-रिपेयर से जुड़ा कानून

राइट-टू-रिपेयर से जुड़े कानून की बात करें तो इसका उद्देश्य रिपेयरिंग में आने वाली समस्याओं को दूर करने से कहीं ज्यादा स्वतंत्र रिपेयरिंग करने वाले और कंपनियों के अधिकृत रिपेयर पार्टनर के बीच समान अवसर उपलब्ध करना है। हालांकि, कानून यह तय नहीं करते हैं कि पार्ट्स किफायती होने चाहिए। इस नियम के तहत इकेक्ट्रिनिक गैजेट्स निर्माताओं को अपने ऑथराइज्ड रिपेयरिंग नेटवर्क के साथ ही साथ आम लोगों को भी इस्तेमाल किए जाने वाले स्पेयर पार्ट्स को उचित शर्तों के साथ सुविधाजनक तौर पर इस्तेमाल के लिए उपलब्ध करवाना चाहिए।

Photo- Social Media

सर्विस सेंटर के खर्च से मिलेगी उपभोक्ताओं को राहत

राइट-टू-रिपेयर के अधिकार के अंतर्गत कंपनियों को ऐसे प्रोडक्ट बनाने होंगे, जिन्हें यूजर्स सुविधा पूर्ण तरीके से खुद रिपेयर कर सकें। इस तरह से उपभोक्ताओं का सर्विस सेंटर जाकर रिपेयरिंग के लिए भाग दौड़ करना और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को रिपेयर करने में लगने वाले पुर्जों के अधिकार को कंपनियों के ऑथराइज्ड नेटवर्क से महंगे दामों में खरीदने से भी बचत होगी। राइट-टू-रिपेयर को कानूनी तौर पर लागू करने की दिशा में इस समय ग्लोबल स्तर पर काम हो रहा है। इस राइट टू रिपेयर अधिकार को चलन में लाने के लिए कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं।

इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ने की ये है वजह

राइट-टू-रिपेयर की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे यूरोपीय संघ की एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार समय से पहले ई कचरे के तौर पर फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अकेले EU की सीमा में हर साल 3.5 करोड़ मीट्रिक टन कचरा और 26 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन को पैदा करने का काम कर रहें हैं। इसके पीछे मुख्य वजह ये है कि अकसर ऐसा देखा जाता है कि लोग अपने खराब और टूटे उपकरणों को रिपेयर कराने की जगह उन्हें बदलना पसंद करते हैं। और अपने पुराने उपकरण को कचरे में फेंक देते हैं। इस तरह से खुले में फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन का खतरा पैदा होता है। राइट-टू-रिपेयर की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे।

राइट-टू-रिपेयर अधिकार को नही मिल रहा सहयोग

राइट-टू-रिपेयर अधिकार को पूरी तरह से लागू करने में कई तरह की अड़चनें सामने आ रहीं हैं। जिनमें मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का निर्माण करने वाली कंपनियां सहयोग नहीं दे रहीं हैं। उनका तर्क है कि मरम्मत में कोई दिक्कत होने से कंपनियों की प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है।

ग्राहक अपना डिवाइस ठीक करते समय तकनीकी ज्ञान न होने के कारण घायल हो सकते हैं। वहीं इस तरह से फोन हैकिंग की संभावनाएं काफी ज्यादा बढ़ सकती हैं। साथ ही ये भी कहा कि राइट-टू-रिपेयर के लागू होने से कम्पनी के बौद्धिक संपदा अधिकारों का उल्लंघन होगा।

राइट-टू-रिपेयर नीति एन्वायरमेंट फ्रेंडली साबित होने के साथ ही ग्राहकों को सस्ती रिपेयरिंग की सुविधा भी मिलती है। इन सारी सुविधाओं के बावजूद ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, अल्फाबेट और मेटा जैसी दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां राइट-टू-रिपेयर के विरोध में जाकर खड़ी हो चुकी हैं।

क्या कहते हैं राइट-टू-रिपेयर के समर्थक

कंपनियों के राइट-टू-रिपेयर के विरोध में अपनी आवाज उठाने वाले समर्थकों के साथ कंधा से कंधा मिलाते हुए अब इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्माता कंपनियों ने इस मुद्दे पर अब अपनी राय बदलना शुरू कर दिया है। राइट-टू-रिपेयर के समर्थन में ऐपल, सैमसंग, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट आदि कंपनियों ने अब सेल्फ-रिपेयरिंग कार्यक्रम कैम्प लगाने शुरू कर दिए है।

असल में राइट-टू-रिपेयर का विरोध करने की असली वजह उनके रिपेयरिंग बिजनेस को होने वाला घाटा है। हालांकि ऐपल ने अगस्त, 2023 में अमेरिका में राइट-टू-रिपेयर बिल का समर्थन किया था। इससे लोगों को उम्मीद थी कि आईफोन 15 सीरीज को आसान रिपेयरिंग के हिसाब से डिजाइन किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है।

Photo- Social Media

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कैलिफोर्निया में तीन साल तक स्पेयर पार्ट्स और जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य

कैलिफोर्निया के बिल के तहत लगभग 4,000 रुपये से 8,000 रुपये के बीच लागत वाले उपकरणों के लिए 3 साल तक स्पेयर पार्ट्स और जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इसके अलावा 8,000 रुपये से अधिक लागत वाले उपकरणों के लिए सात साल तक सपोर्ट देना अनिवार्य है। राइट-टू-रिपेयर मामले में कैलिफोर्निया के बिल को काफी ज्यादा महत्व दिया जाता है। इस कानून का उद्देश्य खराब सामानों को फेंकने में कमी लाना है।

Shashi kant gautam

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