TRENDING TAGS :
Hardoi News: लंबित भुगतान के चलते आरटीई में विद्यालय नहीं दिखा रहे रुचि, कई विद्यालयों का बकाया है लाखों
Hardoi News: गरीबों के लिए आने वाली योजनाओं में शिक्षा माफिया का बड़ा दखल होता है ऐसे में जरूरतमंदों तक शासन की योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता है। अनिवार्य शिक्षा अधिनियम में भी शिक्षा विभाग की मनमानी बदस्तूर जारी है।
Hardoi News (Pic:Newstrack)
Hardoi News: जनपद में शिक्षा विभाग लगातार शासन के निर्देशों के बाद भी मनमानी करता रहता है साथ ही शिक्षा विभाग सवालों के घेरे में भी रहता है। शिक्षा माफियाओं के आगे विभाग नतमस्तक नजर आता है। शिक्षा माफिया विभाग में बड़े-बड़े कारनामे करते रहते हैं। गरीबों के लिए आने वाली योजनाओं में शिक्षा माफिया का बड़ा दखल होता है ऐसे में जरूरतमंदों तक शासन की योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता है। अनिवार्य शिक्षा अधिनियम में भी शिक्षा विभाग की मनमानी बदस्तूर जारी है। गरीब घर के बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए सरकार द्वारा राइट टू एजुकेशन की सुविधा चलाई जा रही है। लेकिन शिक्षा विभाग द्वारा विद्यार्थियों को प्रवेश और भुगतान में कुछ खास विद्यालयों को ही प्राथमिकता दी जा रही है साथ ही राइट टू एजुकेशन के तहत जनपद में कई ऐसे छात्रों को दाखिला भी दिया जा रहा है जो की इसकी पात्रता में नहीं आते हैं।
राइट टू एजुकेशन के तहत विद्यालयों को समय से भुगतान नहीं होता है। इसके चलते अब ज्यादातर विद्यालय राइट टू एजुकेशन से दूरी बना रहे हैं। शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत जनपद में संचालित होने वाले विद्यालयों में 25 फ़ीसदी गरीब परिवार के बच्चों को प्रवेश देने का नियम है और इसके लिए प्रत्येक वर्ष फरवरी मार्च में शिक्षा विभाग की ओर से आवेदन मांगे जाते हैं।
आरटीई के तहत माँगे जाते है आवेदन
गरीब बच्चों को निजी विद्यालय में एडमिशन के लिए राइट टू एजुकेशन की सुविधा दी जाती है। इसके लिए प्रत्येक निजी विद्यालय की मैपिंग आरटीई पोर्टल पर होनी चाहिए। राइट टू एजुकेशन के तहत विद्यार्थी के प्रवेश लेने पर विद्यालय को ₹5000 की धनराशि शुल्क के रूप में और विद्यार्थी को 5400 किताबें व यूनिफॉर्म आदि के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। जनपद में शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 1212 विद्यार्थी पोर्टल में दर्ज है जबकि प्रवेश लेने वाले विद्यालयों की संख्या 20 भी नहीं है। इससे गरीब परिवार के विद्यार्थियों को योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
दरअसल समय से भुगतान न होने के चलते विद्यालय अब राइट टू एजुकेशन में अपनी दिलचस्पी नहीं दिख रहे हैं। सरकार की ओर से राइट टू एजुकेशन के तहत पढ़ने वाले विद्यार्थियों का शुल्क विद्यालय को भेजा जाता है। शहर के एक निजी स्कूल संचालक ने बताया कि उनके स्कूल में 10 बच्चे राइट टू एजुकेशन के तहत पढ़ रहे हैं। विद्यालय का शुल्क 15 से 20 लाख रुपए बकाया चल रहा है यही हाल कई अन्य निजी स्कूलों का भी है उनके शुल्क का भुगतान भी नहीं हुआ है।