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Maha Kumbh 2025: भारतीय संस्कृति के गर्वपूर्ण इतिहास, परम्परा, वर्तमान के कालखण्ड को प्रकाशित करता है महाकुम्भ

Maha Kumbh 2025: स महाकुम्भ ने विश्व के समक्ष भारत राष्ट्र के सामर्थ्य को स्थापित किया है। उत्तर प्रदेश तथा विशेषतः प्रयागराज का महत्व, विश्व के स्तर पर अधोलिखित किया है।

Om Prakash Mishra
Published on: 5 March 2025 10:50 AM
Prayagraj News
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Prayagraj News (Image From Social Media)

​किसी राष्ट्र की चेतना का प्रकटीकरण, राष्ट्र की अस्मिता को प्रस्फुटित करती है। महाकुम्भ एक कोई सामान्य पर्व/मेला/त्यौहार नहीं, वरन् भारतीय संस्कृति के गर्वपूर्ण इतिहास, परम्परा, वर्तमान के कालखण्ड को प्रकाशित करती है।

​पद्मपुराण में प्रयागराज के महाकुम्भ का उल्लेख है:-

​‘‘ ब्राह्मी पुत्री त्रिपथगास्तित्रवेणी,
​समागमेनाक्षतयागमात्रान्।
​यत्राप्लुतान् ब्रहमपदं नयन्ति,
​स तीर्थराजो जयति प्रयागः।।‘‘

अर्थात् सरस्वती, यमुना और गंगा- ये तीन नदियाँ जहाँ डुबकी लगाने वाले मनुष्यों को, जो त्रिवेणी-संगम के सम्पर्क से अक्षत योगफल को प्राप्त हो चुके हैं, ब्रम्हलोक में पहुँचा देती है, उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो।

​वर्ष 2025 यह भारतीय संस्कृति के उत्थान-संवर्धन तथा हमारा नया भविष्य सवारने का शुभारम्भ है। अमरीका की जनसंख्या से लगभग दो गुना लोगों ने महाकुम्भ में पवित्र स्नान किया, यह आने वाले प्रबन्धन विज्ञान के विशेषज्ञो के लिए एक उत्तम अध्यव्यवसाय हेतु अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। इस महाकुम्भ ने विश्व के समक्ष भारत राष्ट्र के सामर्थ्य को स्थापित किया है। उत्तर प्रदेश तथा विशेषतः प्रयागराज का महत्व, विश्व के स्तर पर अधोलिखित किया है।

​प्रयाग शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग प्र का तात्पर्य प्रकृष्ट एवं याग शब्द का अर्थ यज्ञ है। प्रयाग की प्रसिद्धि तीर्थराज के रूप में भारत में रही है। पद््मपुराण में प्रयाग की महिमा का उल्लेख है

”ब्राह्मी पुत्री त्रिपथगास्त्रिवेणी,
समागमेनाक्षतयाग मात्रान््।
यत्राप्लुतान् ब्रहमपदं नयन्ति,
स तीर्थराजो जगति प्रयाग।।“

अर्थात सरस्वती, यमुना और गंगा-ये तीन नदियाँ जहाँ डुबकी लगाने वाले मनुष्यों को जो त्रिवेणी-संगम के सम्पर्क से अक्षत योगफल को प्राप्त हो चुके हैं, ब्रहमलोक में पहुँचा देती है, उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो।

​हजारों वर्षों से महाकुम्भ का आयोजन होता आ रहा है। दान की नगरी में सेवा की यह भावना स्वतः स्फूर्त रही है, सब अपनी सामर्थ्य के अनुसार की परम्परा रही है। यहीं पर राजा हर्षवर्द्धन की शानदार परम्परा विशेषतः इस महाकुम्भ में सजीव हुई। प्रयागराज के निवासियों ने श्रद्धालुओं के लिए अपने घरों के दरवाजे खोले। प्रयागराज के लोग ऐसी सेवा भावना दिखाई की, संभवतः कोई भी श्रद्धालु भूखा-नहीं रह पाया। इस शहर ने मानव मात्र के लिए उत्साह एवं उल्लास से सबका स्वागत किया।

​यह उसी का प्रमाण है कि 66.30 करोड़ श्रद्धालु तीर्थराज प्रयाग पधारे और आध्यात्मिक आनन्द से वापस गये।ं प्रयागराज में अपनी दुकान बन्द करके भण्डारा चलाने के पीछे तीर्थराज के प्रभाव की स्पष्टतः देखा गया है।

​हवाई यातायात का इस शहर ने नया रिकार्ड बनाया है। केवल 45 दिनों में, एक वर्ष से ज्यादा फ्लाइट आयीं। यहाँ का सिविल एयरपोर्ट 2019 में अस्तित्व में आया। वर्ष 2025 की 11 जनवरी से 26 फरवरी तक 5.59 लाख यात्रियों का आवागमन हुआ।

इस मध्य 3350 सिड्यूल्ड फ्लाइट और 1775 नॉन सिड्यूल विमान आये।

​प्रयागराज के टर्मिनल में प्रवेश करने के लिए रेलवे स्टेशन जैसी लाइन लगानी पड़ी। अन्दर करने पर बस स्टेशन जैसी भीड़ देखने को मिलती थी। 25 फरवरी को प्रयागराज प्रदेश का सर्वाधिक व्यस्ततम एयरपोर्ट बना।

​कुम्भ में आने वाले यात्रियों ने अपने मन में यह व्रत ले रखा था कि वे तीर्थ आये हैं, पर्यटक बन कर नहीं। वह यह मानकर ही चले थे कि देर तथा दूर तक पैदल चलेंगे। वृद्ध, अधेड़, युवा व बच्चे परिवार सहित उत्साह से लवरेज पैदल चले। महाकुम्भ के पवित्र स्नान से पुण्य लाभ की तृप्ति लेकर श्रद्धालु गये।

​आर्थिक द्रष्टि से आवागमन के साधनों, दुकानों व अन्यान्य मदों पर व्यय करने में सभी आनन्द की अनुभूति किए। लगभग 1500 करोड़ का व्यय सरकारी हुआ तथा लगभग 3 लाख करोड़ आय का अनुमान है। यह प्रयागराज का महत्व स्थापित करता है।

गोस्वामी तुलसीदास के “रामचरितमानस” के अयोध्याकांड में प्रयागराज की महिमा वर्णित है।

​‘को कहि सकई प्रयाग प्रमाऊ,
​कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।
​ अस तीरथपति देखि मुहावा,
​ सुख सागर रघुवर सुखुपावा।।

अर्थात पापों के समूह रूपी हाथी को मारने के लिए सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव कौन कह सकता हैं। ऐसे सुहावने तीर्थराज का दर्शन कर सुख के समुद्र रघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम जी ने सुख पाया।

भारत में पर्वों का अत्यधिक महत्व है। भारतीय संस्कृति के मूल में पर्वों की प्रधानता है। बालक कें जन्म से ही पर्व एवं संस्कार प्रधान जीवन परिलक्षित होता है।

भारतीय संस्कृति में “कुम्भ” को सृष्टि का प्रतीक माना जाता है। “कुम्भ” के पर्यायवाची शब्द है -घट, भाण्ड एवं कलश।

हमारे यहाँ पूर्ण कुम्भ या महाकुम्भ महोत्सव उत्कृष्ट काल माना गया है। कुम्भ में धरती माता की मिट्टी, अग्निदेव व जलदेवता वरूण का मिश्रण है।“क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा” में से तीन तत्व इस कलश/कुम्भ के आवश्यक तत्व है। ऐसा कोई भी पूजन नहीं है, जिसमें कलश की स्थापना न की जाती हो। यह हमारी आध्यत्मिक परम्परा है।

​पूर्ण कुम्भ में एकत्रित विशाल जनसमुदाय, राष्ट्र का लघुरूप का दर्शन कराता है। इस 2025 के महाकुम्भ में तो भारत राष्ट्र का विराट रूप दिखा।

​‘तीर्थ‘ शब्द तृ (प्लवन तरणयोः) धातु से ‘थक्‘ प्रत्यय के योग से निष्पन्न हैं। ‘‘तीर्थयते अनेन इति तीर्थः‘‘ जिनसे प्राणिमात्र संसार-सागर से तर जाते हैं उसे तीर्थ कहा जाता है। प्रयागराज को तीर्थराज इसलिए कहा जाता है क्योकि इसका वर्णन इसी रूप में वेदों, पुराणों, उपनिषदों, बाल्मीकि कृत ‘रामायण‘, वेद व्यास रचित ‘महाभारत‘ तुलसीदास रचित ‘रामचरित मानस‘ आदि ग्रन्थों में उपलब्ध है।

​मनुस्मृति में कहा गया है-

​‘‘ हिमवद्धिन्ध्यो मध्ये यत्प्रवनशनादपि।
​प्रत्यमेव प्रयागाच्च् मध्यदेशः प्रकीर्तितः।।

​अर्थात हिमालय और विन्ध्याचल के बीच उस स्थान से पूर्ण जहाँ सरस्वती नदी बालू में लुप्त हो जाती है और ‘प्रयाग‘ के पश्चिम भाग में जो देश भाग है, उसे मध्यदेश कहा जाता है।

​स्व0 शीतला प्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘‘अक्षयवट‘‘ पुस्तक के प्रयाग महात्म्य शताध्यायी में ‘‘अक्षयवट‘‘ की महत्वपूर्ण चर्चा उल्लिखित है। कुछ अंश-

​क्षेत्र चूड़ामणिर्यत्र राजते वटवृक्षराद्।
​शैव ताण्डव संदृष्टो, माधवो वास मंगलः।।

​अक्षयवट जहाँ क्षेत्र का शिरोमणि है और शिव ताण्डव से प्रसन्न होकर माधव का मंगलमय वास है। इसी अक्षयवट से राजा हर्षवर्द्धन ने अपना सब कुछ दान दे दिया था।

​हिमालय की वर्षा हो या मानसून की वर्षा, प्रकृति ने भारतीय उपमहादीप को जल से विभूषित किया हैं कुम्भ जल स्त्रोतों की महत्ता का भी परिचायक हैं इस बार महाकुम्भ में संगम पर जिस तरह अपार जन समूह ने स्नान कर अपने को धन्य किया उसकी अपेक्षा किसी को नहीं थी। कुम्भ मेले का आयोजन हिन्दू धर्म की सबसे प्राचीन मान्यताओं में से एक है। कुम्भ के आयोजन के पीछे पौराणिक एवं धार्मिक कारण ही नहीं है, वरन् खगोलीय कारण भी हैं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवताओं और दानवों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया। इस मंथन के समय अमृत का एक कुम्भ यानी कलश निकला। वह असुरों के हाथ लग गया। जिसे बचाने के लिए देवता आगे आए। इसी क्रम में कुछ बूँदें प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में गिरीं। इन चारों स्थानों पर कुम्भ का आयोजन हुआ। इनमें प्रयागराज के कुम्भ अत्यधिक महत्व है।

​प्रयागराज में अदृश्य सरस्वती व गंगा व यमुना का मिलन होता है। यह आस्था करोड़ो सनातनियों की प्रेरणा उन्हें तीर्थराज की ओर खीचती है।

​कुम्भ आध्यात्मिक ज्ञान का केन्द्र ही नहीं वरन् वह सांस्कृतिक आयोजन के आदान-प्रदान को केन्द्र भी बनता है। इसके अतिरिक्त यह सामाजिक समरसता का भी परिचायक होता हैं।

भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना में कुम्भ के योगदान का मूल्यांकन वर्ष 2025 के महाकुम्भ को सैकड़ों वर्षों तक स्मरण किया जायगा।

​बूँद अपनी सीमायें तोड़कर दूसरी बूँदों से मिलते जलाशय-सरिता और समुद्र बन जाती हैं। महाकुम्भ की धारणा ऐसी ही है।

​ ओम प्रकाश मिश्र

​पूर्व मुख्य कार्मिक अधिकारी

​उत्तर मध्य रेलवे

​66, इरवो संगम वाटिका

​देव प्रयागम, झलवा, प्रयागराज

​उत्तर प्रदेश, पिनकोड-200015

​मो0-7376562525

Ramkrishna Vajpei

Ramkrishna Vajpei

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